Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
तरन्ति सरितं स्फीतां संसारासारसेविनः ।
त एवात्मविचाराख्यमभ्यासं न त्यजन्ति ये ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिससे संसार असार बन
जाता है, ऐसे विवेक की सेवा में सदा निरत रहनेवाले जो उत्तम पुरुष आत्मविचाररूप अभ्यास
को नहीं छोड़ते, वे ही इस महाविस्तृत मायारूपी नदी को तैर जाते हैं