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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 7, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

मृगतृष्णाम्बुवद्विश्वमवस्तुत्वात्सदप्यसत् । यश्चेदं भाति तद्ब्रह्म न किंचित्किंचिदेव वा ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह सारा जगत्‌ ब्रह्य का विवर्त ह इस तरह इस जयत्‌ में बल्यविवर्तता का अवलोकन ही त्याग है / बाधित हुए जयत्‌ को कच्छ समझने से तो को भी बह्मस्वरूप प्रिद्ध नहीं होता है, किन्तु अधिष्ठानरूपतापत्ति की भावना करने पर तो सम्पूर्णा पदार्थ ही ब्रह्मरूप प्रिद्ध हो जाते हैः यह कहते हैं / मृगजल के समान यह सारा विश्व अवस्तुरूप होने के कारण सद्रूप से प्रतीत होने पर भी असद्रूप है । जो कुछ भी भासित हो रहा है वह सब ब्रह्मरूप ही है अथवा यों कह सकते हैं कि यह सारा दृश्यप्रपंच कुछ भी नहीं है या कुछ है ही