Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
इति मायेव दुष्पारा चिच्छक्तिः परिजृम्भते ।
इत्थमाद्यन्तरहिता ब्राह्मी शक्तिरनामया ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, वर्णित
रीति से जीवचिति की शक्तिरूप अविद्या ऐन्द्रजालिक माया के सदृश चारों ओर फैली हुई है
ओर ब्राह्मी मायाशक्ति, जो आदि एवं अन्त से शुन्य है, इसी प्रकार चारों ओर फैली हुई है, वह
विद्यारूप है, क्योकि उसमें आवरणशक्ति न रहने के कारण वह निरामय है