Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
न महाकल्पकल्पान्तसंविदः संविदम्बरे ।
संभवन्ति पृथग्रूपाः पयसीव पयोन्तरम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में विद्यमान दूसरा
जल यानी समुद्र में विद्यमान तरंग आदि पृथक् स्वरूप का नहीं होता, वैसे ही संविदाकाश में प्रतीत
महाकल्प ओर कल्प के अन्त की संवित् भी पृथक् स्वरूप की नहीं हो सकती