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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

दुःखशूलसमाचारा द्वन्द्वशूलाखिलप्रजा । अधर्मशूलवनिता पानशूलजनेश्वरा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जनों के आचरण दुःखरूप शूलरोग से आक्रान्त हो गये, समस्त प्रजा शीत-उष्ण आदि द्रनदरों से आक्रान्त हो गई, अधर्मरूप शूलरोगवाली स्त्रियँ बन गई ओर राजवर्ग मद्य आदि के पान में ही निरत हो गया