Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verses 39–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verses 39–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
उल्लसद्विपुलावर्तप्रोत्क्षिप्तमकरोत्कराः ।
विमज्जन्निस्तलावर्तनिगीर्णगिरिकन्दराः ॥ ३९ ॥
दरीदलनसंप्राप्तदृषद्दशनदन्तुराः ।
श्रृङ्गलम्बिदरीप्रान्तमग्नवीचिजलेभकाः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
उल्लासयुक्त अनेक बड़े-बड़े आवर्तो के द्वारा समुद्र
मगर आदि जलचरों को ऊपर की ओर फेंक रहे थे तथा अगाध आवर्तों से अनेक पर्वत और उनकी
गुफाओं को अपने उदर में निगल जा रहे थे