Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथाकृष्टवति प्राणान्स्वयंभुवि नभोभवः ।
विराडात्मनि तत्याज वातस्कन्धस्थितः स्थितिम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर जब विराट्स्वरूप ब्रह्माजी ने अपनी प्राणवायुओं
का निरोध किया, तब वातस्कन्धनाम से स्थित आकाश में उत्पन्न वायु ने अपनी ग्रह, नक्षत्र
आदि को धारण करने की मर्यादा छोड़ दी
सर्ग सन्दर्भ
इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवों सर्ग ब्रह्माजी के प्राणनिरोध से वायु के क्षय का और प्रसंगवश पूछी गई विराट् स्थिति का वर्णन।