Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
चिदणोर्भासनं भातं तत्प्रदेशेन देहगम् ।
येन पश्यति तच्चक्षुः संग्रहोऽक्षदृशामिति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब इसमें रुपावित्रिपुटी के सिद्ध हो जाने पर वश्च आदि करणों के विभाग की भी कल्पना
अगत्या त्रिद्ध हो जाती हैं, यह संक्षेप स्रें बतलाते हैं /
चितिरूप अणु को यानी जीव को सूर्य आदि के प्रकाश का जिस गोलकच्छिद्र से भान होता है
या जिस अतीन्द्रिय-करण से वह देखता है, वे दोनों ही देहगत चक्षु हैं, यही न्याय श्रोत्र आदि सब
इन्द्रियदृष्टियों में लागू है, यह संक्षेप से जान लेना चाहिये