Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
इत्थं स्वानुभवेनैष व्योम्नैव व्योमरूपभृत् ।
आतिवाहिकनामान्तर्देहः संपद्यते चितेः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इसी रीति से अपने ही संकल्प के प्रभाव से यह आकाश के सदृश निर्मलरूप धारण करनेवाला
चिदाकाश अपने आप ही चिति के अन्दर सर्वप्रथम आतिवाहिक शरीर फिर देहेन्द्रियादि विभाग,
फिर नाम, यों समस्त जगत के स्वरूप में विवर्तित हो जाता हे