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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

स्पन्दसंवेदनात्तेन स्पन्द इत्यनुभूयते । यः स एवानिलाभिख्यो वातस्कन्धात्मना स्थितः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

स्पन्द की संवित्‌ से वे स्पन्द का अनुभव करते हैं । उनके जो प्राण हैं उन्हीकी संज्ञा पवन पड़ी हुई है । वे वातस्कन्धरूप से स्थित हैं