Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथा ध्यानेन देहान्तस्तिष्ठसि त्वं यथा स्थितम् ।
तथास्ते निजदेहेऽन्तः संकल्पात्मा पितामहः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी,
मानसपूजा करते समय ध्यान लगाकर हृदय में कल्पित रत्नमण्डप के भीतर स्थित देव में
प्रविष्ट होकर उस देवता की छत्र, चामर, व्यंजन, दर्पण, ताम्बूल आदि से परिचर्या कर रहे
अपने को उस देवता के समीप में स्थित जैसे आप अनुभव करते हैं, वैसे ही संकल्पस्वरूप
पितामह भी अपने शरीर के भीतर स्थित रहते हँ