Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
साकारो गगनात्मास्तु निराकारं स्वप्नस्तु वा ।
आस्ते बहिरथान्तश्च भिन्ने बाह्यान्तरे बहिः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वरूप से बाहर स्थित हैं अतः वे भिन्न है अर्थात् इन्हींका भेद होता है, आन्तर सद्रूप की जो आपने
कल्पना कर रखी है उसका भेद नहीं होता