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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथाग्रस्थब्रह्मलोको ब्रह्मणि ध्यानशालिनि । निक्षिप्ताक्षः शनैर्दिक्षु दृष्टवानहमग्रतः ॥ १ ॥ द्वितीयमर्कं मध्याह्ने पश्चादभ्युदितं स्फुटम् । दिग्दाहमिव दिग्वक्रे वनदाहमिवाचले ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रासंगिक प्रश्न को समाप्त कर अब एकमात्र प्रस्तुत आख्यायिका का अनुसन्धान करते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब ब्रह्मदेव ध्यान में लवलीन हो गये तब इन्द्र के सहित उनके नगर तथा सुमेरु पर्वत के शिखर का पतन देखने के बाद मैंने धीरे से दिशाओं की ओर अपनी आँखें दौड़ायीं, तब मैंने अपने सामने पश्चिम दिशा की ओर साफ उदित हुए-दिशाओं के मुँह में दाह के सदृश तथा पर्वत के ऊपर वनदाह के समान, मध्याहन काल के सूर्य से भिन्न एक दूसरे ही सूर्य भगवान्‌ को देखा

सर्ग सन्दर्भ

चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त पचहत्तरवाँ सर्ग ब्रह्मा के ध्यान में तत्पर होने पर बारह सूर्या की उत्पत्ति तथा सारे संसार को जला रही प्रलयाग्नि का वर्णन ।