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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

अनग्निरग्निदाहो द्रागदृश्योल्मुकगुल्मकः । अनग्निनाग्निदाहेन तेन तामरसेक्षण ॥ १० ॥ अङ्गानि दावदग्धानि खिन्नानीव ममाभवन् । प्रदेशं तमथ त्यक्त्वा दूरमारूढवानहम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कमलनयन, इसके बाद झट बिना अग्नि के ही अग्निका दाह तथा अदृश्य उल्मुकं के गुल्मक उत्पन्न हुए । अग्निरहित उस सौराग्नि के दाह से मेरे सभी अंग दावाग्नि से दग्ध अतएव खिन्न-से हो गये । उसके वाद उस प्रदेश को छोडकर मैं बहुत दूर आकाश में आरूढ हो गया