Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
जह्णुर्वीचीकरैर्देहे जडाः प्रकुपिता इव ।
आशाकाशाशिनामेषां गुहागुहगुहारवान् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर सारी
दिशाओं तथा सारे आकाश को ग्रास कर जानेवाले या उन्हे पूर्ण कर देनेवाले इन सागरो के गुहामुख
से निकले हुए “गुहगुह” इस तरह के शब्दों का प्रदेशान्तर मेँ गिरितट के संघटन से उत्पन्न अग्नि का
शब्द पाठ करने लगा यानी अपने गुरुजी के द्वारा कहे गये शब्दों का अनुकरण जैसे शिष्यध्वनि करती
है वैसे ही गुहामुख से निःसृत “गुहगुह” शब्दों का अनुकरण वह आग्नेय शब्द करने लगा