Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
स्थिरकल्पानलज्वालातुल्यविद्युन्मयाचलः ।
एककोणकविश्रान्तसप्तार्णवपयोभरः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, वह जो मेघमण्डल आया, वह सुस्थिर कल्पान्त की अग्नि की ज्वालाओं के सदृश
अतिभयानक विद्युन्मय पर्वतो से सुशोभित लग रहा था । उसने अपने एक कोने में ही सात समुद्रो
का असीम जल-भण्डार भर लिया था