Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मृतामृतमहद्भूतमज्जनोन्मज्जनाकुलान् ।
तरंगमकरावर्तप्रतिबिम्बान्वितानिव ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
नील-पर्वत रुपी द्रोणकाकों का ही दो विशेषणों से वर्णन करते हैं /
मृतक एवं जीवित प्राणियों के, मज्जन और उन्मज्जनं से व्याकुल तथा तरंग और मकराकार
आवर्तो में प्रतिबिम्बित हुए जैसे नीलपर्वत रूपी डोमकौओं का जलरूपी जालों से मानों वह हरण
कर रहा था