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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

ज्ञातं ततोऽवधानेन मया नभसि तिष्ठता । यावन्निर्वाणमापन्ना ब्रह्मवत्सर्व एव ते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

नामरूप से शून्य भाव को प्राप्त होने पर भी स्वरुप से तो वे सबके सव निर्वाण रूप से ही स्थित थे, यह महाराज वस्तिष्ठजी अपने अनुभव से दिखलाते हैं / इसके बाद आकाश में स्थित मैंने ध्यान से जाना कि वे सभी लोग तो ब्रह्माजी के समान ही नामरूप का परित्याग कर निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं