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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

स्त्रीबालपुरुषादीनां वास्तव्यानामितस्ततः । क्रीडार्थं स्थापिता यत्र नानारचनयान्तरे ॥ १२ ॥ भूतबीजपरापूर्णास्तमोरिपुसघुंघुमाः । तमःप्रकाशचित्राख्या लोकान्तरसमुद्गकाः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसके भीतर इधर-उधर निवास कर रहे स्त्री, बालक तथा पुरुषों की क्रीडा के लिए पाताल, स्वर्ग एवं अन्य लोकों के आकार की पिटारियाँ स्थापित की गई है, जो बीच-बीच में जहाँ-तहाँ अनेकविध नदियों, पर्वतों, जंगलों, हाथियों, घोड़ों, देवताओं, पक्षियों तथा मनुष्यों आदि की तरह-तरह की रचनाओं से युक्त है, वे पिटारियाँ कहीं प्राणियों तथा उनके उपभोग की वस्तुओं से ठसाठस भरी हैं, कहीं अन्धकार के विघातक मणियों, प्रदीपो, सूर्य और चन्द्र आदिकों के द्वारा व्यवहार चलने से शब्दयुक्त हैं एवं कहीं अन्धकारों तथा कहीं प्रकाशों से उनकी विचित्र तरह-तरह की संज्ञाएँ पड़ी हैं