Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 8, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 8, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
प्राप्तो विवेकपदवीमसि पावनात्मन्पुण्यां पवित्रितजगत्त्रितया द्वितीयाम् ।
नाधः पतिष्यसि पुनर्मनसाऽमुनेति जानामि मौनममलं पदमुत्सृज त्वम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकज्ञानप्राप्ति से ही वुन्हे मुक्ति अवश्य मिल सकती है, ऐसा में अनुमान करता हूँ. यों
युनजन्मादि की संभावना से भयभीत हुए उस विद्याधर करो आश्वासन देते हैं /
हे शुद्धबुद्धे, अपने पतन के हेतुभूत अविवेक पद की अपेक्षा न करके तीनों जगत् को पवित्र
करनेवाली इस दूसरी पुण्यमय विवेक पदवी को तुम प्राप्त हो चुके हो, अतः इस मन से तो
तुम फिर अधःपतन में नहीं गिर सकते हो, ऐसा मैं अनुमान करता हू । इसलिए तुम वाणी और
मन की चेष्टा से शून्य निर्मल चिन्मात्रपद का अवलम्बन करके मन आदि इस दृश्यसमूह का
परित्याग कर दो