Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 79
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 79
संस्कृत श्लोक
ऋक्षोत्करो भ्रमति दीपसहस्रयन्त्रचक्रक्रमेण मणिवर्षणवेगचारुः ।
अन्तर्बहिश्च परितः प्रणयेन मुक्त विद्याधरामरगणैरिव पुष्पवर्षम् ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी यन्त्र-चक्र में हजारों की संख्या में
दीपक लगे हों और वह यदि घूमता हो तो कितना सुन्दर लगता है, ठीक इसी क्रम से वेग से हो रही
मणियों की वृष्टि के सदृश अतिसुन्दर नक्षत्रों का समूह घूम रहा था । इसकी शोभा उस तरह की
थी, जैसे आपकी सभा में विद्याधरो एवं देवताओं के गण द्वारा प्रीति से छोडी गई पुष्पवृष्टि भीतर-
बाहर भ्रमण करती है