Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
संहारसर्गसुखदुःखभवाभवेहानीहानिषेधविधिजन्ममृतिभ्रमाद्याः ।
सार्धं पृथक्च विलसन्ति सदैव सर्गे व्यामिश्रतामुपगता अपि तत्र भावाः ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
भगवती के शरीर में जो सर्ग दिखाई देता था, उसमें सृष्टि, प्रलय, सुखदुःख, भव-अभव,
इच्छा-अनिच्छा, विधि-निषेध, जन्म-मरण आदि परस्पर विरूद्ध भी सब पदार्थं कभी सदा एक
साथ एवं कभी अलग-अलग रूप से विलसित होते मालुम पड़ रहे थे