Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 88
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 88 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 88
संस्कृत श्लोक
तस्याश्चिदम्बरमये वपुषि स्वभावभूतास्फुटानुभवभावजगद्व्यवस्थाः ।
सर्वक्षया मलिनदृक्कलिताम्बरस्थकेशोण्ड्रकस्फुरणवत्परितः स्फुरन्ति ॥ ८८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, परमार्थ-दशा में चिदाकाश उसकी देह में स्वभावभूत यानी अशास्त्रीय
ज्ञान से सिद्ध मायारूप आवरणात्मक अस्फुट अनुभव से उत्पन्न जगत् स्थितियाँ एवं जगत्प्रलय
चारों ओर ऐसे कलित होते थे, जैसे तिमिर रोग से मलिन हुई दृष्टि से आकाश में केशोण्ड्कों के
स्फुरण प्रतीत होते हैं