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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 96

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 96 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 96

संस्कृत श्लोक

तस्यां विभाति तदनन्तशिलात्मकोशे लेखाब्जचक्ररचनादिवदेव दृश्यम् । व्योमात्मकं गगनमात्रशरीरवत्यां चित्त्वाद्द्रवज्जलधिकोश इवोर्मिलेखा ॥ ९६ ॥

हिन्दी अर्थ

विवर्त एवं परिणाम की दष्ट से तथा जीवन्मुक्त एवं युक्तिवादी आत्माओं की द्वष्टि से उत माया में जो जयत्‌ का ज्ञान हो सकता हैं, इसमें दो दृष्टान्त कहते हैं / भद्र, उस देवी के शरीर में विद्यमान उस अनन्त स्फटिक शिलारूप कोश में यह दृश्य एक रेखा में रचित कमलचक्रादि-सा ही प्रतीत होता है और आकाश मात्र शरीरधारिणी उसमें चिद्रूप के कारण यह दृश्य आकाशात्मक होकर ऐसे भासता है, जैसे द्रवस्वरूप समुद्रकोश में ऊर्मिरेखा प्रतीत हो रही हो