Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 98
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 98 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 98
संस्कृत श्लोक
शिरोमन्दाश्रितोग्राग्निदग्धस्थाणुवनावनिः ।
कल्पान्तवातव्याधूता वनमालेव नृत्यति ॥ ९८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मैं क्या वर्णन करू, कल्पान्तकाल के
महारुद्र के ललाट-स्थान का दृढ़तापूर्वक आश्रय कर रही जो उग्र तृतीय नेत्राग्नि है, उससे दग्ध हुए
अतएव स्थाणु के रूप में बचे हुए अरण्यं से युक्त भूमिवाली, कलपान्त वायुओं से कम्पित वनमाला
के सदृश वह महादेवी नृत्य कर रही थी