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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

एवंविधाभिः संज्ञाभिर्मुधाभावनयेदृशाः । स्वभावमात्रबोधेन भवन्त्येते तु तादृशाः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्यथा ग्रहण करनेवाली अविद्या द्वारा इस तरह की संज्ञाओं से ब्रह्मा, विष्णु आदि ऐसे हो जाते है । लेकिन परमात्मास्वभावमात्र का बोध होने पर तो वे सब चिन्मात्रस्वभाव ही हो जाते हैं