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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

ज्ञाने तु शान्तिं स तथोपयाति यथा न सोऽब्धिर्न तरङ्गकोऽसौ । यथास्थितं सर्वमिदं च शान्तं भवत्यनन्तं परमेव तस्य ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कहते है-अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तो वह जीव वैसे शान्ति को प्राप्त हो जाता है जिससे कि न तो वह समुद्र रहता है ओर न उसमें तरंग ही । यथास्थिति यह सम्पूर्ण जगत्‌ उसके लिए परम शान्त अनन्त ब्रह्मरूप ही हो जाता है