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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

शिवं तत्सच्छिवं साक्षाल्लक्ष्यते भैरवाकृति । तथास्थितो जगच्छान्तौ परमाकाश एव सः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

निरतिशयानन्देकरस वह ब्रह्म ही नीलकण्ठ, त्रिनेत्र आदि रूप धरकर प्रलयकाल में भैरवाकार उपासको द्वारा दिखाई देता है, क्योकि उन उपासको की वासनानुसार वह परमाकाश ही जगत्‌ की शान्ति के समय भगवान्‌ भैरव की उस आकृति से युक्त स्थित रहता है