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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

कटकादि विना हेम कथमास्तां विलोच्यताम् । कथं स्वभावेन विना पदार्थस्य भवेत्स्थितिः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

स्रविषयता स्वभाव होने से भी अज्ञात चिति के आकार का किसी तरह परित्याग नहीं।किया जा सकता; इस आशय से कहते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, विचारिये तो सही, भला कटक आदि अलंकारस्वरूपता को प्राप्त किये बिना सुवर्णं की स्थिति कैसे रह सकती है, क्योकि स्वभाव के बिना यानी अपने स्वभाव को छोड़कर किसी भी पदार्थ की स्थिति रह कैसे सकती है ?