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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

पवनस्य यथा स्पन्दस्तथैवेच्छा शिवस्य सा । यथास्पन्दोऽनिलस्यान्तः प्रशान्तेच्छस्तथा शिवः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अब शिवजी की इच्छारूप वह कालानि शिवजी से अभिन्न है. यह कहते हैं / जैसा पवन का स्पन्दन है, वैसी ही वह कालरात्रि शिवजी की इच्छा है इससे पवन के भीतर का स्पन्दन जैसे पवन के स्वरूप से अलग नहीं है, किन्तु पवन स्वरूप ही है और अस्पन्द ही है, वैसे ही शिवजी की इच्छा शिवजी के स्वरूप से अलग नहीं है, शिवस्वरूप ही है और अनिच्छा ही है । अतः इच्छात्मिका कालरात्रि पूर्णकाम शिव से अभिन्न है, यह जान लेना चाहिए