Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यथा स्वभावतो व्योम्नि चलत्येवानिशं मरुत् ।
तथा स्वभावात्सर्वत्र पश्यत्येव वपुस्त्विति ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वायु का सवालनस्वभाव हे वैसे ही शरीर आदि की कल्पना करना मनका स्वभाव हैं, यह
कहते हैं /
जैसे वायु स्वभाव से ही आकाश में निरन्तर चलता रहता है वैसे ही मन स्वभाव से सर्वत्र शरीर
आदि का अवलोकन करता ही रहता है