Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
द्रष्टुं प्रवृत्तो रन्ध्रेण येन तच्चक्षुरुच्यते ।
यच्च पश्यामि तद्दृश्यं दर्शनं तु फलं ततः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस छिद्र से मैं देखने के लिए प्रवृत्त हुआ, वह नेत्र कहलाता है, जिसे मैं देखता हूँ,
वह दृश्य यानी रूप कहा जाता है और दर्शन तो उसका फल है ही