Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
एवंरूपमहं जालं भावयन्यत्तदास्थितः ।
तदहंकार इत्यद्य कथ्यते त्वादृशैर्जनैः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह देह, इन्द्रिय तथा विषय की
भावना करता हुआ यानी उनका अभिमानी होता हुआ मैं स्थित हुआ उसीको आजकल आपके
सदश जब "अहंकार" इस नाम से कहते हैं