Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
जगन्मृगतृडम्बूनि भान्ति संविदि संविदः ।
न बाह्यमस्ति नो बाह्ये खे तद्व्योम तथा स्थितम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानस्वरूप परमात्मा में ज्ञान ही जगतरूप मृगतृष्णा जल भासते हैं । यह हमारा
बाह्य जगत् बाह्यआकाश में नहीं है, किन्तु ब्रह्माकार ही वैसा स्थित है