Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 9, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तिमिराक्रान्तदृष्टीनां यथा केशोण्ड्रकादि खे ।
स्फुरत्येवं जगद्रूपमनात्मन्येव तिष्ठताम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्नानिर्यो को तो बाधा पहुँचाती ही है, इस आशय से कहते हैं /
तिमिर रोग से आक्रान्त नेत्रोंवाले पुरुषों को आकाश में जैसे केशोण्ड्रक आदि स्फुरित होते हैं,
वैसे ही संसार में ही अवस्थित रहनेवाले अज्ञानी पुरुषों को यह जगद्रूप स्फुरित होता है (ज्ञानी
पुरुषों को नहीं; वे तो सबक ब्रह्मरूप से ही देखते है)