Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 9, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 9, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
सचेतनाचेतनयोर्हेतुश्चित्त्वात्तथैव चित् ।
विनाशोत्पादयोर्वह्निज्वालायाः पवनो यथा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह सम्पूर्ण द्ृश्यप्रपंच की देशतः स्थिति विति के अन्दर सिद्धकर अब उसे कालतः
सूचित करते हुए चिति की कार्यता प्रिद्ध करते हैं /
चिति अपनी चेतनाशक्ति से सचेतन और अचेतन पदार्थों की पूर्व के ही समान हेतु
(विवर्तोपादान) ऐसे हैँ, जैसे कि अग्निज्वाला के विनाश और उत्पत्ति का हेतु पवन है । तात्पर्य यह
है कि चिति का विवर्त ही चिति का चमत्कार है