Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
न मया न च देहेन नान्येनास्वादितात्म यत् ।
तदन्तर्विवृतं चेत्यमज्ञानाय तदप्यसत् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ लोग विषय को ही आनन्दरूप ओर आस्वाद लेने योग्य मानते हैं; परन्तु यह मानना
उवित नहीं हैं, विषय तो असत् और दुःखरूप है तथा वह आस्वाद लेने योग्य है ही नहीं; अतः
विष्य को अलय कर आनन्द को बतलाते हैं /
जो विषयरूप चेत्य है, उसका न तो मैंने (अधिष्ठान चेतन ने), न स्वाद लेनेवाले पुरुष की देह
ने और न जीव ने ही स्वाद लिया है, क्योकि उसमें आत्मचिति ने अपने अन्दर जो स्फुरण किया है,
वह जीवों के अज्ञानार्थ (व्यामोहार्थ) ही है जिससे वह विषय उत्पन्न हुआ, वह अज्ञान भी असत्
ही है, जो स्वयं असत् है, उससे असत् अर्थ की ही उत्पत्ति मानना उचित है