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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सर्वत्रैवास्ति पृथ्व्यादि स्थूलं तच्च न किंचन । चिद्व्योमैव यथा स्वप्नपुरं परमजातवत् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र पृथ्वी आदि स्थूल पदार्थ हैं और यथार्थ में वह कुछ नहीं भी है, अनुत्पन्न स्वप्ननगर के सदृश है, यदि कुछ है तो केवल पर चिदाकाश ही वस्तु है