Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
रसाकर्षणसव्यग्रो नित्यं भ्रातेव तेजसः ।
हरणादानकर्तॄणामङ्गानां विनियोगकृत् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी,
रसके आकर्षण के लिए मैं निरन्तर व्यग्र रहता था, इससे तेजका मैं भाई-सा बन गया था ओर
हरण, आदान आदि करनेवाले हाथ आदि अंगों का मैं चालक था