Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
भुक्तं पीतमनन्तासु भ्रान्तं च वनभूमिषु ।
दृष्टानि सुखदुःखानि किमन्यदिह साध्यते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
खूब खाया और पीया, अनन्त विभूतियों में
विचरण किया, सुखदुःख भी खूब भोगे, अब दूसरा करने को बचा ही क्या है ?