Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 93, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 93, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
शरीरं पर्णवद्भ्रंशि जीवितं जीर्णसंस्थिति ।
धीरधीरतया ग्रस्ता रसा नीरसतां गताः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
नाभि के निकट भाग में चित कर रखे हुए उनके दो हाथों की शोभा ठीक खिले हुए दो
कमलो की शोभा के सदृश थी, मालूम पड़ता था कि वे करकमल क्या हैं मानो बाहर आये हुए
हृदयकमल के प्रकाश ही हैं उनकी दीप्ति से वे प्रकाशमान थे