Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अहमन्यान्प्रपश्यामि पार्थिवाकारभासुरान् ।
मामातिवाहिकात्मानं न कश्चिदपि पश्यति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
पार्थिव आकार के तुल्य भासुर यानी देदीप्यमान अन्य
प्राणियों को मैं तो देखता था, लेकिन स्थूलशरीरधारी मुझे वहाँ कोई भी नहीं देखता था