Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 52–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 52,53
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकदेहस्य तस्य तच्चिरभावनात् ।
सर्गानुभवनं भूरि ब्रह्मणो ब्रह्मरूप्यपि ॥ ५२ ॥
गतं प्रकटतोत्कर्षादाधिभौतिकदेहताम् ।
तेनैव सर्ग इत्युक्तो भेदसंततिभासुरः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्मशरीरधारी उस ब्रह्म का यह सगनुभव
ब्रह्मस्वरूप होने पर भी चिरकाल की भावना से अधिक प्रकटता के उत्कर्ष से यानी अधिक प्रकट
होने से अधिभौतिक शरीरता को प्राप्त हो गया है, जो अनेक भेदसमूहों से भासुर है