Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 78
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 94, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 78
संस्कृत श्लोक
काश्चिद्वहुनरप्राप्तस्वप्ननिर्माणलोकवत् ।
नान्योन्यमपि पश्यन्ति नानासंस्थानसंस्थिताः ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
इनकी अनेक संस्थानों में अवस्थित कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं, जो बहुधा मनुष्य के स्वप्न में
निर्मित होनेवाले लोगों की तरह परस्पर भी नहीं देखती