Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तच्चेतनं चेन्म्रियते तज्जनाः प्रत्यहं मृताः ।
ब्रूत किं न मृता यूयं तन्मृतं किल चेतनम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर यदि चैतन्य अपना मरण देखता है, यह माना जाय तो वह सदा ही अपना मरण देखा
करेगा, ऐसी स्थिति में जी रहे पुरुषों को छदा की मरण का अनुभव होता रहेगा, यह कहते हैं /
आत्मरूप चेतन यदि मरता हो, तो प्रतिदिन यानी निरन्तर आत्मारूप जीव मरे हुए ही हैं,
यह मानना होगा, फिर क्या आप लोग मरे हुए ही हैं, यह कहिए, क्योकि चेतन को तो आप
लोगों ने मृत ही माना