Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
यद्यद्यथा जगति चेतति चेतनात्मा तत्तत्तथानुभवतीत्यनुभूतिसिद्धम् ।
दृष्टं विषामृतदृशेव पदार्थजातं नातोस्ति संविदविधेयमितिप्रसिद्धम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित अर्थ का निगमन करते हुए उफसलार करते हैं /
श्रीरामजी, इस जगत् में पुरुष भ्रान्ति से जिस वस्तु को जिस रूप से कल्पना कर लेता
है, उस वस्तु का उसी रूप से अनुभव करने लग जाता है, यह बात सर्वविदित है । इसलिए
ये सब पदार्थ विषामृतदुष्टि के सदुश (यानी विष को अमृत समझने के सदुश) कालादिवश
अनियतादि ज्ञानरूप संवित् के अनुसार ही व्यवस्थित है, अतः कुछ भी वस्तु चितिरूप आत्मा
से भिन्न है ही नहीं, यह बात निर्विवादरूप से सिद्ध हो चुकी है