Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 96, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 96, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
यथा पुरं भवत्स्वप्ने चिद्रूपं स्वात्मनि स्थितम् ।
अखण्डमेवमासृष्टेरामहाप्रलयस्थितेः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
द्ष्टान्त में भी यह बात समान है, यह कहते हैं /
जैसे स्वप्न में नगरादिरूप होकर भी चिन्मय आत्मा अपने स्वरूप में ही स्थित है, वैसे ही
सृष्टि से लेकर महाप्रलयपर्यन्त की अवस्था तक जगद्रूप होकर भी ब्रह्मरूप चैतन्य अपने स्वरूप
में ही स्थित है