Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कलविङ्कघटन्यायो धर्म इत्यपि तद्विदाम् ।
तथात्मसिद्धेर्म्लेच्छानां तद्देशेषु न दुष्यति ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घड़े में
बन्द बटेर (तीतर की तरह की एक छोटी चिड़िया) घड़े का मुँह खोल देने पर उड़कर बाहर
चला जाता है, वैसे ही देह के भीतर बन्द देह जितना बड़ा जीव कर्मक्षय हो जाने पर उड़कर
परलोक में चला जाता है, यों जैनों की कल्पना है, यह भी सत्य है, इसी प्रकार यवन लोग
मानते हैं कि जीव देह जितना ही बड़ा है उसका उत्पादन ईश्वर ने किया है। शरीर जहाँ गाड़ा
जाता है, वहींपर वह रहता है, कभी कालान्तर में ईश्वर उसके विषय में विचार करते हैं, तब
उन्हीं की इच्छा से उसकी मुक्ति होती है या स्वर्ग नरक में उसको छोड़ देते हैं, यह भी म्लेच्छों
का मत युक्त ही है, क्योंकि उनकी वैसी ही भावना है