Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अशेषं शून्यमेवेति बौद्धानामेतदेव सत् ।
लभ्यते तद्विचारेण यत्र किंचन नैव हि ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त प्रपंच शून्यात्मक ही है, इस
प्रकार की बौद्धो की कल्पना है । उनकी यह कल्पना भी सत्य ही हैं, क्योंकि ऐसे विचार से उनको
सर्वशून्यता हाथ लग ही जाती है । शून्यवाद में पदार्थो मे अशून्यतापादक जब प्रमाण ही नहीं है,
तब प्रमेय शून्यत्वकल्पना कोई असंभव है ही नहीं