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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

न सज्जनाद्दूरतरः क्वचिद्भवेद्भजेत साधून्विनयक्रियान्वितः । स्पृशन्त्ययत्नेन हि तत्समीपगं विसारिणस्तद्गतपुष्परेणवः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार का स्ज्जनसमायम, युणोपार्जन क्रम से जक तक ज्ञाननिष्ठा न हो जाय तब तक; बीच में कभी छोड़ना नहीं चाहिए, यह कहते है / भद्र, किसी भी काल में सज्जन सदगुरु से दूर नहीं होना चाहिए, किन्तु विनय, सेवा आदि क्रियाओं से युक्त होकर साधु पुरुषों की निरन्तर सेवा करनी चाहिए, क्योकि उन साधुओं के पास जाने मात्र से विचरणशील उनके शान्ति आदि गुण पास जानेवाले में ऐसे संक्रान्त (मिश्रित) हो जाते हैं, जैसे फूलों की सुगन्ध तिलों में सम्बन्धमात्र से मिश्रित हो जाती है